मंगलवार, 25 सितंबर 2012

अस्तित्व

थक चुकी है 
अब धरती;
जीवन का भार ढोते -ढोते!
बिखर जाना चाहती है 
टूट कर, होना चाहती है विलीन 
आकाश गंगा में;
पुनः अपने अस्तित्व के लिए!
बस प्रतीक्षा है 
इसको उस "asteroid" का 
जो अनंत से आ रहा है
लिए एक विनाश 
और पुनर्निर्माण के 
प्रारम्भ का नया सोपान!
ऐसे ही कितने 
होते रहते है विनाश;
और सृजन की
प्रक्रिया चलती रहती है
अनवरत!
और यह "black hole"
बनता रहता है,
अनंत आकाश गंगाएं !

5 टिप्‍पणियां:

  1. सृजन और नाश ,,,जन्म और मृत्यु की तरह सत्य है

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  2. उम्दा पंक्तियाँ ..
    भाषा सरल,सहज यह कविता,
    भावाव्यक्ति है अति सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति,,

    प्रकृति में सृजन और बिनाश प्रक्रिया निरंतर चलाती रहती है ,,,,,

    RECENT POST : गीत,

    उत्तर देंहटाएं

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